जनता को अब पढे लिखे नेताओं की जरूरत नहीं बल्कि साधु-संत और अपराधी छवि वाले नेता चाहिए?

जनता को अब पढे लिखे नेताओं की जरूरत नहीं बल्कि साधु-संत और अपराधी छवि वाले नेता चाहिए?

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शीला दीक्षित, सुनील जाखर, रंजीता रंजन, पप्पू यादव जैसे नेताओं की हार और प्रज्ञा ठाकुर, गिरिराज सिंह, साक्षी महाराज जैसे नेताओं की जीत आज यह साबित कर रही हैं, लोकतन्त्र में जनता जनार्दन होती है जनता मुर्ख होती है या समझदार ये तो पता नही पर इतना अवश्य है कि जनता को नेताओं को कोसने का कोई अधिकार नही हैं कोई भी नेता जबरदस्ती संसद में नहीं बैठता है उसे हम ही चुनते है फिर हमें शिकायत नहीं करना चाहिए लोकतंत्र के मन्दिर में दाखिल होते ही कोई अपराधी सन्त तो हो नही जायेगा बल्कि अपराधी ही रहेगा।

विडंबना देखिये राजा भैया जेल में रहकर चुनाव जीत जाते है और पुलिस अफसर रही किरण बेदी हार जाती है। हमेशा गरीबो के लिए लड़ने वाली मेधा पाटेकर हार जाती है और नशा बेच कर पूरी युवा पीढी को बर्बाद करने वाला मजीठिया जीत जाता है, दयाशंकर जैसों की पत्नी जीत जाती हैं और इरोम शर्मिला हार जाती है। एक शख्श जो लोगो के अस्तिस्त्व और अलग राज्य की लड़ाई के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा कर और एक महिला जो अपने राज्य के लोगो के लिए 16 साल तक लड़ाई लड़ कर भी हार जाते है। समाज ने चुनाव प्रक्रिया में सच्चाई ,सादगी और ओचित्य के सवाल ही हासिये पर रख दिए।

अच्छे ईमानदार और निष्काम भाव से पूरा जीवन ‘लोक’ के लिये दांव पर लगाने वालो के साथ एक निष्ठुर मजाक करती हे ये जनता जनार्दन। इसलिए अब ऐसे लोगों को समाज या लोगों के बारे में सोचना छोड़ देना चाहिए।भरपूर जीवन जिए और अपना और अपने परिवार के बारे में ही सोचिये। समाज को आवश्यकता ही नही आप जैसे लोगों की।

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अच्छे लोगों को जनता इतनी बार सबक सीखा चुकी है पर आप लोग है कि मानते ही नही, अब आप जैसे के लिए दुःख भी नही होता। दुःख होता है उस समाज के लिए जिसके लिए आप जेसे लोग ईमानदारी से कुछ करना चाहते है। आप जैेसे लोगों को हम तो न समझ पाये पर हमारे बच्चे शायद जब इतिहास पड़ते हुए हमसे सवाल पूछेगे तब हम शर्मिंदा होंगे ।

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